किसानों ने गौवंश का किया पूजन, महिलाओं ने की पुत्रों की लंबी आयु की कामना, गांव में उत्सव का माहौल

कृषि प्रधान भारत में गाय और बैल किसानों के लिए परिवार के सदस्य जैसे, पशुओं के प्रति कृतज्ञता का पर्व

बच्छ बारस: माता-पुत्र के अटूट बंधन का प्रतीक

जोधपुर भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को मारवाड़ क्षेत्र में बड़े ही धूमधाम से बच्छ बारस पर्व के साथ मनाया गया। इस दिन माताएँ अपने पुत्रों की दीर्घायु और कल्याण की कामना करती हैं। व्रत रखकर और विशेष पूजा-अर्चना करके, माताएँ अपने पुत्रों के लिए ईश्वर से आशीर्वाद मांगती हैं। यह दिन माता-पुत्र के अटूट प्रेम, विश्वास और श्रद्धा का प्रतीक है। "आओ म्हारा हंसराज, आओ म्हारा बच्छराज....." के मंगल स्वरों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान रहा। ग्रामीण अंचल की महिलाओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ अपने पुत्रों और पशुओं के दीर्घायु होने की कामना की गई।

अलसुबह से ही घरों में तैयारियाँ जोरों पर थीं। महिलाएँ सोलह श्रृंगार करके परंपरागत गीत गाती हुई एकत्रित हुईं। कथा सुनने के बाद गौवंश का विधिवत पूजन किया गया। गाँव की चौपालों और परिंडे के पास, गाय के गोबर से बनी तलैया पर महिलाओं ने अपने पुत्रों का तिलक किया, उन्हें लड्डू खिलाकर मुँह मीठा कराया और मंगलकामनाएँ कीं।
यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि किसानों के जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कृषि प्रधान भारत में गाय और बैल किसानों के लिए परिवार के सदस्यों के समान हैं। वे खेती-बाड़ी में सहायता करते हैं, दूध प्रदान करते हैं और जीवनयापन का आधार बनते हैं। इसलिए बच्छ बारस के दिन किसान इनकी पूजा करते हैं। उन्हें रंग-बिरंगे वस्त्र पहनाते हैं और मीठा भोजन कराते हैं।
एक किसान ने अपनी भावनाओं को साझा करते हुए कहा कि "पशु हमारे परिवार का हिस्सा हैं। इनकी सेवा और पूजन से हमें विश्वास होता है कि आने वाला साल अच्छा होगा और फसलें भरपूर होंगी।"

पूजा के बाद पूरे गाँव में उत्सव का माहौल छा जाता हैं। बच्चे खेलकूद में मस्त रहते हैं, महिलाएँ लोकगीत गाती है और पुरुष आपस में मिलजुल कर समय बिताते है। घरों में पारंपरिक व्यंजन बनते है और सभी मिलकर उनका आनंद लेते है।

सांस्कृतिक महत्व:

बच्छ बारस केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई का प्रतीक है। यह पर्व पशु-मानव के संबंध एवं माता-पुत्र के अटूट बंधन को दर्शाता है और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता को उजागर करता है। यह पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व का भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। हम सभी को इस पावन अवसर पर अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहिए और अपने माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

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